मज़हब (Religiosity)
आ माधो, आ!
बात बताऊँ एक तुझे मैं,
तू पैदा भी नहीं हुआ था,
'इन लोगों' ने ज़ुल्म किये थे...
आ माधो, आ!
बात बताऊँ एक तुझे मैं,
तू पैदा भी नहीं हुआ था,
'इन लोगों' ने ज़ुल्म किये थे,
हम पर कितने।
आ माधो आ;
भोंक दे भाला,
'उस औरत' के पेट के अन्दर,
कोख में 'उम्मीद' पलती होगी,
जिसका नाम ख़यालों में था।
ख़ून का इक फ़व्वारा उठे,
मींच लियो तू अपनी आँखें,
रहम कहीं दिल से न गुज़रे,
भाले का तो धर्म नहीं है।
आ असलम, आ!
बात बताऊँ एक तुझे मैं,
तू पैदा भी नहीं हुआ था,
'इन लोगों' ने ज़ुल्म किये थे,
हम पर कितने।
आ असलम, आ!
फोड़ दे इस बम को इन पर,
'उस बच्ची' को उड़ा दे इकदम,
आँखों में पलता इक ख़्वाब था शायद,
जिसका ज़िक्र ख़यालों में था।
चीथड़े उड़े जब 'उस बच्ची के',
मींच लियो तू अपनी आँखें,
रहम कहीं दिल से न गुज़रे,
इस बम का तो धर्म नहीं है।
आ असलम, आ! आ माधो, आ
छोड़ दे पल्ला उस मोमिन का,
उस पण्डित का।
उस औरत के पेट में पलती,
उस बच्ची को उस ज़ोया को,
उस राधा को,
आज़ाद करें 'उस बेड़ी' से,
उम्मीदों से पलने दें,
उन ख़्वाबों को, उन ज़िक्रों को
आज़ाद करें उस माधो क, उस असलम को
'इन नफ़रत' की ज़ंजीरों से
नफ़रत की बर्बादी तक जंग रहेगी,
जंग रहेगी इंसानों की आज़ादी तक,
जंग रहेगी, जंग रहेगी