छठी शताब्दी ईसा-पूर्व भारत की भव्य पृष्ठभूमि पर आधारित, 'बोधिपुरुष: माया, छल और ज्ञानोदय' एक ऐतिहासिक दार्शनिक गाथा है। यह एक साधारण कृषक सुभूति के जीवन और नियति के माध्यम से भारतीय दर्शन, मानव मन के द्वंद्व, और सिद्धार्थ के बुद्धत्व की ओर उठते कदमों की ऐसी अनसुनी कहानी है जो पाठकों को आत्मचिंतन के अभूतपूर्व शिखर पर ले जाती है।
सांख्य, चार्वाक, न्याय और जैन दर्शन के गहन तत्वों को मानवीय पीड़ा, वासना, अहंकार और अंततः साक्षी भाव के साथ एक अनूठे ताने-बाने में पिरोया गया है।
दर्शन देखें →पहाड़ों के सन्नाटों, विलगता और मानवीय अनुभूतियों के सुंदर संगम से सजी विहंगम हिंदी कविताएँ एवं विचारोत्तेजक शब्दचित्र।
कविताएँ पढ़ें →लेखक के कैमरे के लेंस से देखे गए कुमाऊँ और हिमालयी जीवन, प्रकृति, धूप और आध्यात्मिक मौन के अद्वितीय क्षण।
चित्रशाला देखें →"काल की गति भी विचित्र है; प्रतीक्षा में मंद हो जाती है और आनंद में तीव्र।"